झारखंड का नाम आते ही ज्यादातर लोगों के जहन में सबसे पहले जो ख्याल आता वो होता है जंगल, आदिवासी, गरीबी, अशिक्षा और नक्सलवाद का। ये ख्याल आना भी लाजिमी है क्योंकि दशकों से झारखंड की पहचान ही यही रही है। लेकिन अब आपको अपनी ये सोच बदलनी ही होगी। क्योंकि आज मैं आपको झारखंड की वो तस्वीर दिखाने जा रहा हूं जो एक नए झारखंड का नेतृत्व करती है, एक नए झारखंड को दुनिया के सामने पेश कर रही है और बता रही है की जंगल, आदिवासी, गरीबी, अशिक्षा और नक्सलवाद के नाम से पहचाने जाने वाला झारखंड अब बदल रहा है। ये तस्वीर है उभरते झारखंड की, तरक्की करते झारखंड की, बेटियों को होनहार बनाते झारखंड की। इस खबर में जिन महिला सिपाहियों की तस्वीर आप देख रहे हैं उसी तस्वीर में दिखाई दे रही महिला सिपाहियों के हौसले और जज्बे को क्रमानुसार बयां करता हूं। तस्वीर में बाएं से सबसे पहले दिखने वाला चेहरा है रानी कुमारी का। गिरिडीह जिले के बारासौली गांव में जन्मी रानीकुमारी शादीशुदा हैं, उनका ससुराल गिरिडीह जिले के पचबा गांव में है। उनके पति जेसीबी चलाते हैं, उनका एक बेटा भी है रिशु जो चार साल का है और यूकेजी में पढ़ता है। रानी कुमारी के दो भाई और बहनें भी शिक्षित हैं। उनके पिता श्रीवर्धन गुडी पेशे से दर्जी हैं और मां हाउस वाइफ हैं। अनुसूचित जाति से आने वाली रानीकुमारी ने मैथ और फिजिक्स से बीएससी किया है। बीसीए कर रही थीं लेकिन बीच में छोड़ना पड़ा। रानी कुमारी ने उस सोच को तोड़ा है जो हमने झारखंड को लेकर बना रखी है। ससुराल और मायके की सारी जिम्मेदारियों को उठाते हुए उन्होंने झारखंड असिस्टेंट पुलिस में जाने का रास्ता चुना। 6 महीने की ट्रेनिंग पूरी हो चुकी है बस पोस्टिंग होनी है। नक्सल एवं रूढ़िवाद से प्रभावित क्षेत्र में उन्होंने नारीशक्ति की बेहतरीन मिसाल पेश की है। हालांकि रानी कुमारी बताती हैं कि उनका सपना टीचर या सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने का था लेकिन जिंदगी में कुछ ऐसे हालता बने की उन्होंने सुरक्षा के क्षेत्र में जाने का रास्ता चुना। लेकिन उन्होंने अपने कदमों को रोका नहीं है। रानी कुमारी बताती हैं कि उन्होंने आईआरबी का प्री और मेडिकल निकाल लिया है बस फिजिकल बाकी रह गया है। तस्वीर में दिख रहा दूसरा चेहरा यशोदा का है जो मधुबन के हरलाडीह गांव की रहने वाली हैं और इन सभी महिला सिपाहियों में सबसे ज्यादा युवा हैं। यशोदा के पिता जिवलाल किराना की दुकान चलाते हैं और मां मीना देवी आंगनबाड़ी में पढ़ाती हैं। यशोदा का कहना है उनका लक्ष्य शुरू से ही सुरक्षा के क्षेत्र में जाने का था और आज उन्होंने वो लक्ष्य हासिल कर लिया है। अतिपिछड़े इलाके से आने वाली यशोदा आज अपनी कामयाबी से बदलते झारखंड की तस्वीर खुद बना रही हैं। यशोदा बताती हैं कि उन पर उनके परिवार का कोई प्रेशर नहीं था उन्होंने अपनी मर्जी से इस क्षेत्र को चुना है। समय के अभाव में यशोदा से ज्यादा बात नहीं हो सकी इसलिए उनके बारे में बस इतनी है जानकारी हासिल कर पाया। फोटो में दिख रहा तीसरा चेहरा सुमित्रा देवी का है जो मूलरूप से धनबाद की रहने वाली हैं लेकिन वर्तमान में गिरिडीह में रहती हैं उनकी पोस्टिंग भी गिरिडीह में ही है। झारखंड असिस्टेंट पुलिस में हवलदार के पद पर तैनात सुमित्रा देवी नए प्रशिक्षुओं को ट्रेनिंग देती हैं। 2008 से सेवाएं दे रही सुमित्रा देवी को झारखंड के विपरीत हालातों में काम करने का काफी अनुभव है और वो नए प्रशिक्षुओं से भी अपने अनुभव को साझा करती हैं। सुमित्रा देवी के पति बैंककर्मी हैं और उनके दो बेटे और एक बेटी है। सुमित्रा देवी के तीनों बच्चे शिक्षित हैं। सुमित्रा देवी बताती हैं कि उनका लक्ष्य भी सुरक्षा के क्षेत्र में सेवाएं देने का था जिसे उन्होंने हासिल किया और अब अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रही हैं। तस्वीर में दिख रहा चौथा चेहरा सोनाली हेमरम का है। अनुसूचित जनजाति से आने वालीं सोनाली हेमरम धर्म से ईसाई हैं। तीसरी तहसील के लक्षरायडीह गांव की रहने वाली सोनाली के पिता मतियेश हेमरम पेशे से सिविल कॉन्ट्रेक्टर हैं और उनकी मां मरियम हाउस वाइफ हैं। इंटरमीडिए पास सोनाली हेमरम ने भी रूढ़वादिता को पीछे छोड़ते हुए अपना रास्ता खुद चुना और आज वो सुरक्षा के क्षेत्र में सेवाएं देकर झारखंड का नाम रौशन कर रही हैं। 6 भाई बहनों में सबसे बड़ी सोनल हेमरम पर जिम्मेदारी भी सबसे ज्यादा है जिसे वो बखूबी निभा रही हैं। वो चाहती हैं कि भारत की हर बेटी उनकी ही तरह अपना रास्ता खुद चुने और एक मिसाल कायम करे। वैसे सोनाली हेमरम ने अपने बारे में मुझे एक और बात बतायी थी लेकिन मैं उसे आपके साथ शेयर नहीं करूंगा क्योंकि वो उनका निजी मामला है। तस्वीर में दिख रहा आखिरी चेहरा मंजु कुमारी का है। मंजु कुमारी के हौसले ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया। डुमरी थाना क्षेत्र के चंदनाडीह गांव की रहने वाली मंजु कुमारी अपने गांव की इकलौती ऐसी लड़की हैं ग्रेजुएशन किया और अब डी.लिट कर रही हैं। पिछड़ा वर्ग से आने वाली मंजु कुमारी के पिता झंडुसाब एक गरीब किसान हैं। पहले वो धनबाद में रिक्शा चलाते थे। गरीब परिवार में मुश्किल हालातों में पली-बढ़ीं मंजु कुमारी शादीशुदा हैं और उनके पति बस कंडक्टर हैं। मंजु कुमारी बताती हैं कि उनका सपना टीचर बनने का था लेकिन हालातों ने उनके इस सपने पर ब्रेक लगा दिया….लेकिन आज वो झारखंड असिस्टेंट पुलिस में सेवाएं देकर भी बहुत खुश हैं। और हां उन्होंने अभी अपने कदम रोके नहीं हैं रानी कुमारी की तरह उन्होंने ने भी आईआरबी में प्री और मेडिकल निकाल लिया है और बस फिजिकल निकालना बाकी रह गया है। मंजु कुमारी बताती हैं कि उनके भाई वीरेंद्र साब ने भी टेट की परीक्षा पास कर ली है। मित्रों झारखंड की ये पांचों बेटियां आज अपने प्रदेश का नाम रौशन कर रही हैं। नक्सल प्रभावित जैसे इलाके में सेवाएं देकर इन्होंने वाकई साबित कर दिया है कि नारी शक्ति किसी के आगे नहीं झुकती। झारखंड की इन बेटियों को न्यूज बीके सलाम करता है।

(ये पूरा लेख एक विशेष अवसर पर लिए गए इंटरव्यू पर आधारित है)

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